भटकन से मंजिल की ओर

ए राही, तू रस्ता ना भटक
बेगानी राहों में, ना अटक
   अविचलित, अकेले ही निकला
                         था पथ पर"
कोइ नही था, दूर तलक तट पर
अडिग, अविरल बहती धारा मे
                        खुद को पिरोये"
धीर भरे कदमों में, कांटे चुभोये
    दिग्भ्रमित ना जरा हुआ तू,
                        चलता चला
मगर अब ये क्या हुआ तुझे
                          तू ये कहां चला
, फिर से स्वयं का संग्रह कर,
अनजानी महफिलों का विग्रह कर
         मंजिल भी तेरी थी, रस्ता भी तेरा हो, ये तय कर
ना सौंप खुद को, औरौं को,
  मन पर ऐसी, विजय कर"
भटकन से निकल,
  खुद का खुद पर एहसान कर
तू वो नही जो अभी है,
   खुद से खुद की पहचान कर,
पुकार रही मंजिल तेरी,
  बस कदम बढाना बाकी है
कायनात सी ताकत तुझमे,
 बस एक छलांग लगाना बाकी है
        उठ, फिर से फौलाद बन,
         ऐसा कोई सैलाब बन
बहा ले जाये जो अनगिनत को,
                      बांधे एक धार मे"
असीम सुश्रुषा की बयार में
      तृप्त अंतर्मन से तभी तू जहां
                        से जा पायेगा
      तेरा जर्रा - जर्रा, जब औंरो के
                          काम आयेगा,
पदचिन्हों में ऐसी विरासत को,
                              छोड जा
भावी पीढियों को, ईसानियत
                के रूख पर मोड जा"

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