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भटकन से मंजिल की ओर

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ए राही, तू रस्ता ना भटक बेगानी राहों में, ना अटक    अविचलित, अकेले ही निकला                          था पथ पर" कोइ नही था, दूर तलक तट पर अडिग, अविरल बहती धारा मे                         खुद को पिरोये" धीर भरे कदमों में, कांटे चुभोये     दिग्भ्रमित ना जरा हुआ तू,                         चलता चला मगर अब ये क्या हुआ तुझे                           तू ये कहां चला , फिर से स्वयं का संग्रह कर, अनजानी महफिलों का विग्रह कर          मंजिल भी तेरी थी, रस्ता भी तेरा हो, ये तय कर ना सौंप खुद को, औरौं को,   मन पर ऐसी, विजय कर" भटकन से निकल,   खुद का खुद पर एहसान कर तू वो नही जो अभी है,    खुद से खुद की पहचान कर, पुकार रही मंजिल तेरी,   बस कदम बढाना बाकी है कायनात...

आत्म ज्ञान की ओर..

ये मैं हूं या कोई ओर है, अन्तर्मन मे कैसा ये शोर है।  बेजान  सा तन है या मुझमें मैं                                जिंदा हुआ पर कटे हैं मगर आजाद कोई                               परिदां हुआ गैर से विरह की व्यथा है या      स्वयं से मिलन की खुशी है किसी सत्य की तलाश में              ये कैसी खुदकुशी है। टूट के हूं चूर, या कोई गुरूर है,    बेसुध सा मैं या कोई सुरुर है। ये उजडा है चमन या          पल्लवित कलियों का आगाज है, कराहता सा दामन मेरा या                  बुलंदियों भरी आवाज है। बेगानो से  तिरस्कृत हुआ या           आत्मस्वीकृत हुआ ये कैसी शक्ति से चमत्कृत हुआ। बिराने आइने सेआत्मज्ञान की ये                ...